बुधवार, 15 अगस्त 2012

चाँद की गली में ------

अचानक नुक्कड़ से आव़ाज एक आई 
चरमराती खिड़की से झाँक 
मंगल की पुकार इक आई ।

इशारों -इशारों मैं तय कर लिया 
बस उस मोड़ रुख कर लिया 
घुप्प अँधेरे में सीढ़ियाँ चढ़ 
मिचमिचाती आँखों से टटोलते 
गिरते -पड़ते मुख्य द्वार पर 
जब दस्तक दे डाली 
बांहें पसारे स्वागत 
कर रहा था कोई 
अंदर आने का निमंत्रण 
दे रहा था कोई ।

हर कमरे को परखना है अब 
हर कोने से पहचान बढ़ानी है 
aliens को मित्र बनाना है ।
इक नया इतिहास रचाना है ।
इस ग्रह को अपना गृह बनाना है 


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