अपनी अपनी सोच -------
एक राजा के मन में ख्याल आया कि एक ऐसा महल बनवाना है जिसे देख सब दांतों तले उंगली दबाने लगे।दूर -दूर से कारीगर ,मिस्र्त्री ,पत्थर ,कालीन ,शीशा आदि मंगवाए गए ।जैसे जैसे महल बनता गया वैसे वैसे उसके चरचे सभी जगह होने लगे ।
महल बना तो दूर दूर से आम लोग ,बड़े -छोटे राजा -महाराजा ,राजकुमार ,सेनापति आदि उसे देखने आने लगे ।सारे आते और महल की खूब प्रशंसा करते ।चारों ओर केवल महल की ही चर्चा थी ।राजा को प्रशंसा सुनने मैं मजा आने लगा ।एक तरह से उसे इसका नशा हो गया । महीनों बीत गए धीरे--धीरे लोग आने कम हो गए। राजा उदास रहने लगा । उसका खाना-पीना कम हो गया। एक दिन उसके राज्य का एक बहुत बड़ा कलाकार महल देखने आया। राजा ने बड़े उत्साह से उसे महल दिखाना शुरू किया। बहुत विस्तार से हर चीज़ के बारे में बताने लगा- ये कालीन ईरान से आया है, ये पत्थर जयपुर से आया है, ये रत्न मिस्र से आये हैं.... इस तरह से पाँच -छह घंटे लग गए। अंत में राजा का ध्यान गया कि मैं ही बोलता रहा, कलाकार तो कुछ बोला ही नहीं। हूँ - हाँ तक नहीं की।
राजा ने कहा ," क्या बात है भई तुम्हे महल पसंद नहीं आया क्या? मैं बोलते -बोलते थक गया, कुछ खाया पीया तक नहीं और तुम चुप रहे। जो भी महल देखने आया वह तारीफ़ करते नहीं थका, और फिर तुम तो इतने बड़े कलाकार हो, तुम्हे तो सुन्दरता की ज़्यादा समझ है।" कलाकार बोला ," महल तो सुन्दर है पर मेरे मन में एक ही बात घूमती रही कि महल का प्रवेश द्वार कितना छोटा बनवाया है।"
राजा बोला तो क्या हुआ? कलाकार ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया कि बस मैं तो यही सोच रहा था कि कल पे जब तुम मरोगे, तो तुम्हारी अर्थी कैसे निकलेगी? यह सुनते ही राजा को बहुत गुस्सा आया । तारीफ़ के तो दो शब्द कहे नहीं और मेरे मरने की बातें कर रहा है? राजा ने उसे जेल में बंद कर दिया।
रात के समय सिपाही ने आकर बताया कि कलाकार की पत्नी आयी है। राजा ने उसे पूरी बात बतायी। यह सुनकर वह बोली, " महाराज! मेरे पति बहुत सनकी हैं। आपके महल के बारे मैं तो मैंने भी सुना था। मेरी भी बड़ी इच्छा थी उसे देखने की। आप दिल छोटा न करें, मुझे दिखाइए महल। मेरे पति को भला इन चीज़ों की क्या समझ?"
राजा को लगा कि पत्नी समझदार है। वैसे भी आज का दिन बहुत बुरा गया। चलो, इसे ही महल दिखाता हूँ। राजा ने उसे भी सारी चीज़ें विस्तार से समझाकर दिखाईं। पर उसने देखा कि पत्नी भी सारे समय चुप रही। राजा चिढ़कर बोला,"तुम तो कहती थी तुम्हारा पति सनकी है लेकिन मुझे तो तुम भी सनकी लग रही हो।"
इस पर पत्नी ने कहा, " नहीं राजा! मैं तो बस यह सोच रही थी कि मेरे पति ने कितनी मूर्खता भरी बात कही। मैं तो कहती हूँ कल पर जब आप मरोगे तो अर्थी निकालने की क्या ज़रुरत है? यहीं फर्श तोड़कर गाड़ देंगे।" यह सुनते ही राजा आग बबूला हो उठा। उसने उसे भी कैद में डाल दिया । राजा का मूड बिगड़ गया।
सारी रात राजा को नींद नहीं आई। तारीफ़ सुनने का नशा था। नशे की खुराक न मिले तो नशेड़ी बावला हो जाता है। सुबह कलाकार का बेटा आया। कहने लगा," माँ-बाप बूढ़े हो गए हैं। उन्हें पता नहीं चलता कि कैसे बात की जाती है। अब उनका दिमाग काम नहीं करता।"
बेटे ने महल देखने की इच्छा ज़ाहिर की। लेकिन वही ढाक के तीन पात। बेटा भी कुछ नहीं बोला। राजा के पूछने पर बोला,"माँ-बाप ने कमी तो खूब पकड़ी, पर उपाय मूर्खतापूर्ण बताया। मैं तो कहता हूँ कल पे जब तुम मरोगे तो न तो दरवाज़ा तोड़ने की ज़रुरत है, न तो फर्श तोड़ने की। तुम्हारे शरीर के छोटे-छोटे कई टुकड़े करके खिड़की से बाहर फेंक देंगे। मामला ख़त्म।"
अब आप बताइए कि क्या सच में नई पीढ़ी के नौजवान ने येही उत्तर दिया होगा? राजा का अगला कदम क्या था? यदि कलाकार का पोता आता, तो वह क्या कहता? आपके उत्तर के इंतज़ार में........