चाँद की शरारत ----------
अक्सर ऱोज शाम मेरे बरामदे
चाँद ताका -झांकी किया करता है
कभी दरवाजे की दरारों
कभी खिड़की के शीशों
ओर कभी छत से लटक
कभी आड़ा -तिरछा हो
बिजली के खम्भे के पीछे से
इशारे किया करता है
कल तो सारी हया शर्म भुला
आ गया भिक्षुक सा
सीढ़ियों पर दबे पाँव
पीछे -पीछे अमावस आई
ओर झट से ढ्प्पा कर दिया
अब ना जाने कब चाँद
की बारी आयेगी ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें