सोमवार, 20 अगस्त 2012

chand ki sharart

चाँद  की  शरारत ----------

अक्सर ऱोज शाम मेरे बरामदे 

चाँद ताका -झांकी किया करता है 

कभी दरवाजे की दरारों 

कभी खिड़की के शीशों 

ओर  कभी छत से लटक 

कभी आड़ा  -तिरछा  हो 

बिजली  के खम्भे  के पीछे से 

इशारे  किया  करता  है 

कल तो  सारी  हया  शर्म भुला 

आ  गया  भिक्षुक  सा 

सीढ़ियों पर  दबे  पाँव 

पीछे -पीछे  अमावस  आई 

ओर  झट  से  ढ्प्पा  कर  दिया 

अब  ना  जाने  कब चाँद  

की  बारी  आयेगी ।

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