100 सालों का सफ़र ______
मैं कौन हूँ ?
वही जिसके बिना कोई भी शादी , जूस कार्नर का बोर्ड , कॉलेज की fresher party , माता का जगराता , टी .वी . के सीरियल , विज्ञापन की दुनिया और आपके mobile की ring tone अधूरी हैं ।
जी हां -- मैं सिनेमा हूँ ।
100 साल का हो गया हूँ । 1911 से 1930 तक
मूक था फिर भी बतियाता था
अपनी बात सब तक पहुंचाता था
मेरा भी एक सुनहरा ज़माना था ।
वाणी दी मुझे बी' ईरानी ने । आलम आरा छिप कर बनानी पड़ी ईरानी को । पाँच producer और लगे थे इंडिया की पहली बोलती फिल्म बनाने में । रेलवे लाइन के पास ही स्टूडियो था इसलिए जब रात को गाड़ियों का आना -जाना बंद हो जाता तब शूटिंग की जाती । कैमरे की आवाज इतनी होती थी कि उसे कंबलो से ढकना पड़ता । सैट पर जगह -जगह माइक्रोफोन छिपाने पड़ते और वहीं पास में खड़े होकर हीरो -हिरोइन को डायलोग बोलने पड़ते ताकि रेकॉर्डिंग में दिक्कत ना आये ।
कभी पेड़ के ऊपर चढ़ कर
कभी तने के पीछे छिपकर
कभी पलंग के नीचे बैठकर
कभी परदे की चुन्नट बनकर
मेरे musician बजाया करते
सुर -ताल का इतिहास रचते ।
आलम आरा से मैंने बोलना ,बतियाना ,गाना, खिलखिलाना सीखा ।
सही मायनों में मेरी आवाज को तराशा सोहराब मोदी ने ।
बाकी का सफ़र कल जारी रखेंगे ---------------
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